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वन पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
रुरून्कृष्णमृगांश्चैव मेध्यांश्चान्यान्वनेचरान् |  ७   क
वाणैरुन्मथ्य विधिवद्व्राह्मणेभ्यो न्यवेदय़त् ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति