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विराट पर्व
अध्याय २२
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वैशम्पाय़न उवाच
तं सिंहमिव सङ्क्रुद्धं दृष्ट्वा गन्धर्वमागतम् |  २१   क
वित्रेसुः सर्वतः सूता विषादभय़कम्पिताः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति