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कर्ण पर्व
अध्याय ११
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सञ्जय़ उवाच
ततो घोरं महाराज अस्त्रय़ुद्धमवर्तत |  २३   क
ग्रहय़ुद्धं यथा घोरं प्रजासंहरणे अभूत् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति