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विराट पर्व
अध्याय २२
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वैशम्पाय़न उवाच
गन्धर्वो वलवानेति क्रुद्ध उद्यम्य पादपम् |  २३   क
सैरन्ध्री मुच्यतां शीघ्रं महन्नो भय़मागतम् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति