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अनुशासन पर्व
अध्याय २
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भीष्म उवाच
एतद्व्रतं मम सदा हृदि सम्परिवर्तते |  ४३   क
गृहस्थानां हि सुश्रोणि नातिथेर्विद्यते परम् ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति