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भीष्म पर्व
अध्याय ११२
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सञ्जय़ उवाच
शाल्वाश्रय़ास्त्रिगर्ताश्च अम्वष्ठाः केकय़ैः सह |  ११०   क
अभिपेतू रणे पार्थं पतङ्गा इव पावकम् ||  ११०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति