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उद्योग पर्व
अध्याय २२
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धृतराष्ट्र उवाच
गिर्याश्रय़ा दुर्गनिवासिनश्च; योधाः पृथिव्यां कुलजा विशुद्धाः |  २१   क
म्लेच्छाश्च नानाय़ुधवीर्यवन्तः; समागताः पाण्डवार्थे निविष्टाः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति