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कर्ण पर्व
अध्याय ६५
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सञ्जय़ उवाच
सनागपत्त्यश्वरथे उभे वले; विचित्रवर्णाभरणाम्वरस्रजे |  ८   क
चकम्पतुश्चोन्नमतः स्म विस्मय़ा; द्विय़द्गताश्चार्जुनकर्णसंय़ुगे ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति