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उद्योग पर्व
अध्याय २२
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धृतराष्ट्र उवाच
न जातु ताञ्शत्रुरन्यः सहेत; येषां स स्यादग्रणीर्वृष्णिसिंहः |  ३०   क
प्रवेपते मे हृदय़ं भय़ेन; श्रुत्वा कृष्णावेकरथे समेतौ ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति