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उद्योग पर्व
अध्याय २२
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धृतराष्ट्र उवाच
स गच्छ शीघ्रं प्रहितो रथेन; पाञ्चालराजस्य चमूं परेत्य |  ३५   क
अजातशत्रुं कुशलं स्म पृच्छेः; पुनः पुनः प्रीतिय़ुक्तं वदेस्त्वम् ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति