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वन पर्व
अध्याय ९५
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अगस्त्य उवाच
न वै धनानि विद्यन्ते लोपामुद्रे तथा मम |  १९   क
यथाविधानि कल्याणि पितुस्तव सुमध्यमे ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति