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उद्योग पर्व
अध्याय २२
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धृतराष्ट्र उवाच
यद्यत्तत्र प्राप्तकालं परेभ्य; स्त्वं मन्येथा भारतानां हितं च |  ३९   क
तत्तद्भाषेथाः सञ्जय़ राजमध्ये; न मूर्छय़ेद्यन्न भवेच्च युद्धम् ||  ३९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति