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भीष्म पर्व
अध्याय २२
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धृतराष्ट्र उवाच
केषां प्रहृष्टास्तत्राग्रे योधा युध्यन्ति सञ्जय़ |  १७   क
उदग्रमनसः केऽत्र के वा दीना विचेतसः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति