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शान्ति पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः श्रुतिपुराणज्ञाः शिक्षिता रक्तकण्ठिनः |  ३   क
अस्तुवन्विश्वकर्माणं वासुदेवं प्रजापतिम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति