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शल्य पर्व
अध्याय ६
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सञ्जय़ उवाच
सदेवलोके कृत्स्नेऽस्मिन्नान्यस्त्वत्तः पुमान्भवेत् |  ३१   क
मद्रराजं रणे क्रुद्धं यो हन्यात्कुरुनन्दन |  ३१   ख
अहन्यहनि युध्यन्तं क्षोभय़न्तं वलं तव ||  ३१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति