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द्रोण पर्व
अध्याय ९५
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सञ्जय़ उवाच
शकाः किराता दरदा वर्वरास्ताम्रलिप्तकाः |  १३   क
अन्ये च वहवो म्लेच्छा विविधाय़ुधपाणय़ः |  १३   ख
मामेवाभिमुखाः सर्वे तिष्ठन्ति समरार्थिनः ||  १३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति