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द्रोण पर्व
अध्याय २२
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सञ्जय़ उवाच
ऋश्यवर्णैर्हय़ैर्दृष्ट्वा व्याय़च्छन्तं वृकोदरम् |  २   क
रजताश्वस्ततः शूरः शैनेय़ः संन्यवर्तत ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति