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द्रोण पर्व
अध्याय २२
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सञ्जय़ उवाच
नाकुलिं तु शतानीकं शालपुष्पनिभा हय़ाः |  २३   क
आदित्यतरुणप्रख्याः श्लाघनीय़मुदावहन् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति