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द्रोण पर्व
अध्याय २२
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सञ्जय़ उवाच
रुक्ममालाधराः शूरा हेमवर्णाः स्वलङ्कृताः |  ३१   क
काशिराजं हय़श्रेष्ठाः श्लाघनीय़मुदावहन् ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति