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द्रोण पर्व
अध्याय २२
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सञ्जय़ उवाच
विभ्रतो हेममालाश्च चक्रवाकोदरा हय़ाः |  ४७   क
कोसलाधिपतेः पुत्रं सुक्षत्रं वाजिनोऽवहन् ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति