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विराट पर्व
अध्याय ३२
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वैशम्पाय़न उवाच
तं मत्तमिव मातङ्गं वीक्षमाणं वनस्पतिम् |  १७   क
अव्रवीद्भ्रातरं वीरं धर्मराजो युधिष्ठिरः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति