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द्रोण पर्व
अध्याय २२
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सञ्जय़ उवाच
तं विराटोऽन्वय़ात्पश्चात्सह शूरैर्महारथैः |  ८   क
केकय़ाश्च शिखण्डी च धृष्टकेतुस्तथैव च |  ८   ख
स्वैः स्वैः सैन्यैः परिवृता मत्स्यराजानमन्वय़ुः ||  ८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति