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कर्ण पर्व
अध्याय २२
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सञ्जय़ उवाच
तदिदं तव कार्यं तु दूरप्राप्तं विजानता |  २५   क
न कृतं यत्त्वय़ा पूर्वं प्राप्ताप्राप्तविचारणे ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति