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कर्ण पर्व
अध्याय २२
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सञ्जय़ उवाच
इदं तु मे यथाप्रज्ञं शृणु वाक्यं विशां पते |  ३२   क
अनिहत्य रणे पार्थं नाहमेष्यामि भारत ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति