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कर्ण पर्व
अध्याय २२
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सञ्जय़ उवाच
येन दैत्यगणान्राजञ्जितवान्वै शतक्रतुः |  ३७   क
यस्य घोषेण दैत्यानां विमुह्यन्ति दिशो दश |  ३७   ख
तद्भार्गवाय़ प्राय़च्छच्छक्रः परमसंमतम् ||  ३७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति