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कर्ण पर्व
अध्याय २२
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सञ्जय़ उवाच
न हि मां समरे सोढुं स शक्तोऽग्निं तरुर्यथा |  ४४   क
अवश्यं तु मय़ा वाच्यं येन हीनोऽस्मि फल्गुनात् ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति