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द्रोण पर्व
अध्याय ८७
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सञ्जय़ उवाच
अक्षौहिण्यश्च संरव्धा धार्तराष्ट्रस्य भारत |  ४४   क
यत्ता मदर्थं तिष्ठन्ति कुरुवीराभिरक्षिताः ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति