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कर्ण पर्व
अध्याय २२
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सञ्जय़ उवाच
एवमभ्यधिकः पार्थाद्भविष्यामि गुणैरहम् |  ५३   क
शल्यो ह्यभ्यधिकः कृष्णादर्जुनादधिको ह्यहम् ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति