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कर्ण पर्व
अध्याय २२
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सञ्जय़ उवाच
यथाश्वहृदय़ं वेद दाशार्हः परवीरहा |  ५४   क
तथा शल्योऽपि जानीते हय़ानां वै महारथः ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति