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शल्य पर्व
अध्याय ११
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सञ्जय़ उवाच
भर्तृपिण्डविमोक्षार्थं भर्तृकार्यविनिश्चिताः |  ४४   क
स्वर्गसंसक्तमनसो योधा युय़ुधिरे तदा ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति