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शल्य पर्व
अध्याय २२
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सञ्जय़ उवाच
ते समन्तान्महाराज परिवार्य युधिष्ठिरम् |  ११   क
अदृश्यं साय़कैश्चक्रुर्मेघा इव दिवाकरम् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति