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शल्य पर्व
अध्याय २२
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सञ्जय़ उवाच
निर्मर्यादे तथा युद्धे वर्तमाने सुदारुणे |  २०   क
प्रादुरासन्विनाशाय़ तदोत्पाताः सुदारुणाः |  २०   ख
चचाल शव्दं कुर्वाणा सपर्वतवना मही ||  २०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति