शल्य पर्व  अध्याय २२

सञ्जय़ उवाच

विष्वग्वाताः प्रादुरासन्नीचैः शर्करवर्षिणः |  २२   क
अश्रूणि मुमुचुर्नागा वेपथुश्चास्पृशद्भृशम् ||  २२   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति