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शल्य पर्व
अध्याय २२
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सञ्जय़ उवाच
ततो गजाः सप्तशताश्चापपाणिभिरास्थिताः |  ३६   क
पञ्च चाश्वसहस्राणि सहदेवश्च वीर्यवान् ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति