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शल्य पर्व
अध्याय २२
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सञ्जय़ उवाच
रुधिरोक्षितसर्वाङ्गा विप्रविद्धैर्निय़न्तृभिः |  ४६   क
हय़ाः परिपतन्ति स्म शतशोऽथ सहस्रशः ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति