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शल्य पर्व
अध्याय २२
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सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यपरिपिष्टाश्च समासाद्य परस्परम् |  ४७   क
अविक्षताः स्म दृश्यन्ते वमन्तो रुधिरं मुखैः ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति