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शल्य पर्व
अध्याय २२
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सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यमश्वपृष्ठेभ्यो विकर्षन्तो महावलाः |  ५०   क
मल्ला इव समासाद्य निजघ्नुरितरेतरम् |  ५०   ख
अश्वैश्च व्यपकृष्यन्त वहवोऽत्र गतासवः ||  ५०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति