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शल्य पर्व
अध्याय २२
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सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं प्रतिसंरव्धाः समासाद्य परस्परम् |  ६८   क
अहं पूर्वमहं पूर्वमिति न्यघ्नन्सहस्रशः ||  ६८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति