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कर्ण पर्व
अध्याय ५२
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सञ्जय़ उवाच
भार्गवास्त्रं च पश्यामि विचरन्तं समन्ततः |  ६   क
सृष्टं कर्णेन वार्ष्णेय़ शक्रेणेव महाशनिम् ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति