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शल्य पर्व
अध्याय २२
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सञ्जय़ उवाच
वृकगृध्रशृगालानां तुमुले मोदनेऽहनि |  ७५   क
आसीद्वलक्षय़ो घोरस्तव पुत्रस्य पश्यतः ||  ७५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति