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शल्य पर्व
अध्याय २२
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सञ्जय़ उवाच
शिरो गृहीत्वा केशेषु कवन्धः समदृश्यत |  ७९   क
उद्यम्य निशितं खड्गं रुधिरेण समुक्षितम् ||  ७९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति