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वन पर्व
अध्याय ८०
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पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र रुद्रकोट्यां नरः शुचिः |  १२९   क
अश्वमेधमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ||  १२९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति