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आदि पर्व
अध्याय २२०
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वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्गते महाभागे लपितां प्रति भारत |  १८   क
अपत्यस्नेहसंविग्ना जरिता वह्वचिन्तय़त् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति