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शान्ति पर्व
अध्याय २२०
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भीष्म उवाच
नश्यन्त्यर्थास्तथा भोगाः स्थानमैश्वर्यमेव च |  १००   क
अनित्यमध्रुवं सर्वं व्यवसाय़ो हि दुष्करः |  १००   ख
उच्छ्राय़ा विनिपातान्ता भावोऽभावस्थ एव च ||  १००   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति