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शान्ति पर्व
अध्याय २२०
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भीष्म उवाच
रजश्च हि तमश्च त्वा स्पृशतो न जितेन्द्रिय़म् |  १०७   क
निष्प्रीतिं नष्टसन्तापं त्वमात्मानमुपाससे ||  १०७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति