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आदि पर्व
अध्याय २१७
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वैशम्पाय़न उवाच
वह्नेश्चापि प्रहृष्टस्य खमुत्पेतुर्महार्चिषः |  १४   क
जनय़ामासुरुद्वेगं सुमहान्तं दिवौकसाम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति