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शान्ति पर्व
अध्याय २२०
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भीष्म उवाच
वद्धश्च वारुणैः पाशैर्वज्रेण च समाहतः |  १८   क
हृतदारो हृतधनो व्रूहि कस्मान्न शोचसि ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति