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शान्ति पर्व
अध्याय २२०
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भीष्म उवाच
निगृहीते मय़ि भृशं शक्र किं कत्थितेन ते |  २१   क
वज्रमुद्यम्य तिष्ठन्तं पश्यामि त्वां पुरन्दर ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति