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अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
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वृहस्पतिरु उवाच
भोजनं चोरय़ित्वा तु मक्षिका जाय़ते नरः |  ९३   क
मक्षिकासङ्घवशगो वहून्मासान्भवत्युत |  ९३   ख
ततः पापक्षय़ं कृत्वा मानुषत्वमवाप्नुते ||  ९३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति