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शान्ति पर्व
अध्याय २२०
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भीष्म उवाच
सवृक्षौषधिरत्नेय़ं ससरित्पर्वताकरा |  ४८   क
तानिदानीं न पश्यामि यैर्भुक्तेय़ं पुरा मही ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति