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शान्ति पर्व
अध्याय २२०
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भीष्म उवाच
त्वमेव हि पुरा वेत्थ यत्तदा पौरुषं मम |  ७५   क
समरेषु च विक्रान्तं पर्याप्तं तन्निदर्शनम् ||  ७५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति